इम्तियाज अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ का 95 वर्षीय नायक ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरूद्दीन शाह) पाकिस्तान लौटना चाहता है क्योंकि उसने अपनी प्रेमिका अफसाना यानि जिया से वादा कर रखा है कि वह वापस आएगा और उसकी इजाजत के बगैर कहीं नहीं जाएगा। ऊपर से दो युवा प्रेमियों की एक और कहानी दिखने वाली यह फिल्म भारत-विभाजन की अनेक परतें खोलती है और सिर्फ विभाजन को ही नहीं अस्वीकार करती है बल्कि उस उपनिवेशवादी और सांप्रदायिक नैरेटिव के टुकड़े कर देती है जो सरहद को भूगोल से निकाल कर लोगों के दिलोदिमाग में स्थापित करना चाहता है।
सआदत हसन मंटोे की क्लासिक रचना ‘टोबा टेक सिंह’ के नायक ने सरहद को अस्वीकार दिया था और नो मेन्स लैंड में अपनी जान दे दी थी। ईशर सिंह अपना प्राण देते समय ख्यालों में ही सही सरहद पार अपनी प्रेमिका के पास लौट जाता है और इम्तियाज भारत-विभाजन को अस्वीकार करने की कथा को एक नई शक्ल दे देते हैं।
यह सरहद मिटाने की धीमी किंतु मजबूत आवाज है। ‘टोबा टेक सिंह’ की तरह ही ‘मैं वापस आऊंगा’ की थीम भी उपनिवेशवाद और सांप्रदायिकता के गहरे विरोध की है बल्कि उससे भी आगे बढ़ कर मौजूदा दौर के नव-उपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ी होती है।
विभाजन की त्रासदी को गाजा पर ढाए जा रहे कहर और दुनिया के विस्थापितों के दर्द के साथ जोड़ कर इम्तियाज़ इसे मौजूदा दौर के संकट से जोड़ देते हैं। भारत विभाजन का दर्द स्थानीय से वैश्विक बन जाता है। ‘टोबा टेक सिंह’ में लोगों के खिलाफ ब्रिटिश उपनिवेशवाद की साजिश संकेतों में दिखाई देती है। इम्तियाज उसे साफ सामने ला देते हैं। ब्रिटिश न्यायविद रेडक्लिफ कभी भारत नहीं आया था और यहां आने के बाद भी उसने जमीनी हकीकत समझने की भी कोशिश नहीं की और कागज पर ही पंजाब का विभाजन कर दिया।
ईशर सिंह का पोता निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) इसका मखौल उड़ा कर ब्रिटिश साजिश को नंगा कर देता है। भारत और पाकिस्तान के आजाद हो जाने के दो दिन बाद यानि 17 अगस्त तक पंजाब के लोगों को पता नहीं था उनका इलाका किस तरफ गया है। रेडक्लिफ का मखौल उपनिवेशवादी अमानवीयता और क्रूरता का पर्दाफाश करता है। यहीं फिल्म विभाजन के दर्द और मानवीय संवेदनशीलता को बयान करने वाली फिल्म से बढ़ कर एक सशक्त राजनीतिक फिल्म में तब्दील हो जाती है।
ईशर सिंह जिस दुनिया में लौटना चाहता है उसकी तफशील में जाना जरूरी है। इम्तियाज केवल हिंदुओं और मुसलमानों के मेलजोल की किसी रूमानी दुनिया की बात नहीं कर रहे हैं, वह ब्रिटिश गुलामी से मुक्त हो रहे भारत को सामने लाते हैं जो सपने देख रहा है, गतिशील है। हरी भरी वादियों और जानी पहचानी सड़कों पर साइकिल चलाते दो युवा प्रेमियों, जिया (शर्वरी) और किनू यानि युवा ईशर सिंह (वेदांग रैना), के रूपक के जरिए फिल्मकार ने उडान भरते भारत की तस्वीर रखी है।
यह आजादी के आंदोलन से उपजा भारत है जो सेकुलर और लोकतांत्रिक है। इसमें प्रेमचंद हैं, प्रोग्रेसिव राइटर्स है और मुस्लिम लीग की संकीर्णता से टकराता मुसलमान है। सरगोधा में घटित कहानी बंटवारे के पहले के पाकिस्तान में गए मुस्लिम इलाकों की तस्वीर पेश करती है।
भारत में इन दिनोें उन राजनीतिक फिल्मों का दौर है जो सरकारी प्रचार केे काम आती हैं। सत्ता पक्ष के नैरेटिव में विलेन तय हुए व्यक्तित्वों या समुदायों को निशाना बनाना ही उनका मुख्य उद्देश्य होता है। नफरत ही उनका असली स्वर है। इन फिल्मों में मुसलमान और पाकिस्तान आंतकवाद के पर्याय हैं। सतही किस्म का देशप्रेम दिखाने के लिए कुछ ऐसे किरदार भी बना दिए जाते हैं जो अपवाद बन कर मूल नैरेटिव को पुष्ट करें। इम्तियाज ने एक वैकल्पिक नैरेटिव पेश किया है।
ईशर सिंह के भारत को पहचानने की जरूरत है। यह अनेक भाषाओं, धर्मों, रिवाजों और जीवन-मूल्योें के संगम से पैदा हुई उस साझी संस्कृति वाली दुनिया है जो संदियों के हिंसक–अहिंसक संघर्षों और फिर मेलजोल की लगातार चलती प्रक्रिया से बना है। बंटवारा एक ऐसे हादसे की शक्ल में आया जिसने इस दुनिया को उजाड़ दिया। ईशर सिंह इस दुनिया को वापस पाना चाहता है, इसमें लौटना चाहता है।
ईशर सिंह के वापस लौटने की आकांक्षा असल में भारतीय उपमहाद्वीप के सामूहिक अवचेतन मेें बसी बंटवारे को खत्म करने की दबी इच्छा है। राजनीति में कहीं भी इसकी अभिव्यक्ति नहीं है। यही वजह है कि फिल्मकार इसे एक विस्मरण के शिकार अस्वस्थ मन के ख्याल के रूप में पेश करता है। यहां विगत की स्मृति रूपक के रूप में आती है। यह बोल्डनेस टोबा टेक सिंह कहानी के प्रकाशन के समय तो संभव था, क्योंकि उस समय लोग यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि उनका मुल्क बंट गया है।
लेकिन आज दो राष्ट्र के सि़द्धांत को सही ठहराने के इतने नैरेटिव इजाद किए जा चुके हैं कि यह सरहद मिटाने की सोचना भी पागलपन की सीमा में आता है। ईशर सिंह के प्राण जिस गुत्थी में उलझ कर छटपटाहट रहे हैं वह भारत–विभाजन की गुत्थी है। निर्वैर अपने दादा की 78 वर्ष पुरानी प्रेम कहानी की गुत्थी सुलझाने के बहाने विभाजन की गुत्थी सुलझाता है। वास्तव में, ईशर सिंह के प्राण विभाजन की जटिलताओं में उलझी भारत की आत्मा है। उसकी मुक्ति बनावटी बंटवारे को मिटा कर ही हो सकती है।
कुछ बौद्धिकों ने भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों को विभाजन के अतीत में ले जाने की कोशिश की अनुचित बताया है। उन्हें यह किसी जख्म को कुरेदने वाली बात लग रही है। कुछ अन्य इस विभीषिका को हिंदू बनाम मुस्लिम की नजर से देखना चाहते हैं। उन्हें फिल्मकार के सेकुलर नजरिए को लेकर आपत्ति है।
तकनीक के हिसाब से भी यह फिल्म उत्कृष्ट है। विस्मरण के शिकार ईशर के बाकी दुनिया भूल जाने, लेकिन बंटवारे के दौर में बार-बार लौटने और की पीड़ा को बेहतरीन ढंग से दिखाया गया है। फिल्मकार अवचेतन में चल रही कशमकश को महसूस कराने में सफल हुआ है। नसीरूद्दीन शाह ने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है। मंगल ग्रह के लोगों के हमले के रूपक के जरिए फिल्मकार ने यह दर्शाया है कि सांप्रदायिक हिंसा समाज के भीतर से नहीं, बल्कि बाहर से आई है।
विभाजन भारत की सबसे बड़ी ट्रेजैडी है। भारत और पकिस्तान नाम के दो राष्ट्रों की यात्रा दोनों की अवाम को पीड़ा देने वाली रही है। युद्ध, असंख्य हिंसक झड़पों और अनेक आतंकवादी हमलों ने लोगों को भयानक रूप से असुरक्षित कर रखा है। लोग खूनी दंगों और सांप्रदायिक तनाव के शिकार हैं। कुछ इतिहासकारों ने विभाजन को लंबा विभाजन की संज्ञा दी है जो 1947 में शुरू हुआ और खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। अल्पसंख्यक को उनके अधिकारों से वंचित करना दोनों मुल्कों की राजनीति का प्रमुख हिस्सा है।
अतीत में न झांकने की सलाह देने वालोें को यह देखना चाहिए कि बँटवारा भारत की महान सभ्यता को पतन के उस स्थान पर ले आया जिसकी कोई और मिसाल इतिहास में शायद ही मिले। कत्ल, औरतों पर बलात्कार, चोरी, डकैती, राहजनी और आगजनी, हर तरह के अपराध हुए जिसमें लोग सामूहिक रूप से शामिल हुए या उसे स्वीकृति दी। दरिंदगी और नफरत के बीच लाखों लोग मारे गए और करीब दो करोड़ लोग बेघर हो गए।
सदियोें से साथ रहने वाले एक ही नस्ल, एक ही तरह का जीवन जीने वाले और एक ही भाषा बोलने वाले लोग मजहब के नाम पर एक दूसरे के खून के प्यासे कैसे हो गए, यह समझना जरूरी है। इम्तियाज की फिल्म इसे समझने में मदद करती है।
धार्मिेक, भाषाई और अन्य पहचानों के संघर्ष के बीच यह फिल्म इंसानियत, दोस्ती और मुहब्ब्त के नाम पर कुर्बानी देने की नई पहचान लेकर आई है। इस नवउपनिवेशवादी दौर मेें इस पहचान को लोग भूल रहे हैं। यह फिल्म मानवीयता, करूणा और प्रेम की उस फिल्मी परंपरा को पुनर्जीवित करने कर प्रयास करती है जो लुप्त हो रही है। मानवीय भविष्य में लोगों का भरोसा जगाती है।
इम्तियाज ने बंटवारे को लेकर हुए समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों का भरपूर ख्याल रखा है। ईशर का परिवार बंटवारे की हिंसा से बचाने के लिए घर की औरतों को एक मुस्लिम दोस्त के पास छोड़ आया था। असहाय औरतें हिंसा तथा बलात्कार से बचने के लिए अपनी जान दे देती हैं। दोस्त का परिवार भी मुस्लिम लीग की राजनीति से टकराने में खाक हो जाता है। औरतों की रक्षा में विफल ईशर का परिवार एक गहरे अपराध भाव में डूब जाता है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनका पीछा नहीं छोड़ता है।
बंटवारे की हिंसा में औरतें सबसे बड़ी शिकार रहीं और पितृसत्ता तथा उपनिवेशवादी गुलामी उन पर कहर बन कर टूटी। इम्तियाज ने इसे मजबूती से फिल्माया है।
अतीत की छाया में ढंका रिफ्यूजी परिवारों का दर्द और उससे उबरने की कोशिशों को फिल्म ने बेहतरीन ढंग से पेश किया है। इरशाद कामिल के गीत और एआर रहमान के संगीत में पंजाब के लोकनृत्य और संगीत ही नहीं सूफी तथा भक्ति संगीत इस तरह गुंथे हैं कि ये उपमहाद्वीप की सांस्कुतिक विरासत का प्रतिनिधि बन जाते हैं। बंटवारे की त्रासदी एक स्थानीय अनुभव से निकल कर मानवता के अनुभव में बदल जाती है। बंटवारे को अस्वीकार करने वाली ‘मैं वापस आऊंगा’ ‘टोबा टेक सिंह’ की थीम को बहुत आगे ले जाती है।
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और अंग्रेज़ी व हिंदी, दोनों भाषाओं, में नियमित लिखते हैं।)